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Showing posts from June, 2020

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New Height of Mount Everest ( माउंट एवरेस्ट की नई ऊंचाई )

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New Height of Mount Everest ( माउंट एवरेस्ट की नई ऊंचाई ) नेपाल और चीन के संयुक्त सर्वे में  दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की नई ऊंचाई का पता चला है। भारत द्वारा 1954 में बताई गई ऊंचाई 8,848 मीटर से यह 86 सेंटीमीटर ज्यादा है। 2015 में भयानक भूकंप सहित अन्य कारणों से इसकी ऊंचाई में बदलाव की चर्चा के बीच नेपाल सरकार ने इस चोटी की सटीक ऊंचाई मापने का फैसला किया था।  नेपाल और चीन ने मंगलवार को संयुक्त रूप से घोषणा की कि माउंट एवरेस्ट की नई ऊंचाई 8,848.86 मीटर है। काठमांडो में विदेशमंत्री प्रदीप ग्यावली ने इसकी घोषणा की। चीन ने 2005 में ऊंचाई 8844.43 मीटर बताई थी।  पहले दो बार चीन इसकी अलग - अलग ऊंचाई बता चुका है।  शी जिनपिंग का मुख्य एजेंडा था....    पिछले साल जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल यात्रा पर आए, तो एवरेस्ट को संयुक्त रूप से मापने पर सहमति बनाना उनका प्रमुख एजेंडा था। तब पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया था कि चीन अपनी तरफ से भी यह काम कर सकता था। उसने 2018 में इसकी शुरुआत भी कर दी थी। चूँकि यह चोटी नेपाल में पड़ती है, इसलिए चीन के माप को ...

एशिया के देश

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एशिया के देश एवं उनकी राजधानी , क्षेत्रफल , और मुद्रा   Countries of Asia and their capital, area, and currency ( एशिया )       देश          राजधानी          क्षेत्रफल (वर्ग किमी०)      मुद्रा            अजरबेजान                 बाकू                                86,600                                          मनत            अफगानिस्तान           काबुल                             652,225                                   ...

गढ़वाल-कुमायूँ हिमालय (उत्तराखण्ड)

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गढ़वाल-कुमायूँ हिमालय (उत्तराखण्ड) Garhwal-Kumaon Himalaya (Uttarakhand) इसको गढ़वाल-कुमायूं हिमालय कहा जाता है। 9 नवम्बर 2000 से पूर्व यह उत्तर प्रदेश राज्य का उत्तरी भाग था। पश्चिम में टोंस नदी द्वारा हिमांचल प्रदेश से और पूरब में काली नदी द्वारा नेपाल से अलग होता है। उत्तर में तिब्बत तथा दक्षिण में विशाल मैदान द्वारा यह अलग होता है। इसका विस्तार 29° 5' से 31° 15' उत्तरी अक्षांश तक और 77° 45' पूर्व से 80° 45' पूर्वी देशांतर के मध्य में है। इसमें गढ़वाल और कुमायूँ खण्ड शामिल हैं , जिसमे उत्तरकशी , चमोली , पिथौरागढ़, टेहरी गढ़वाल , अल्मोड़ा , नैनीताल , देहरादून , रुद्रप्रयाग ,गढ़वाल , बागेश्वर , चम्पावत व उधमसिंह नगर जिले शामिल हैं। इसका क्षेत्रफल 51125 वर्ग किमी० है।  2001 की जनगड़ना के अनुसार इस प्रदेश की जनसँख्या 7035349 है। जनसँख्या का घनत्व 138 प्रति व्यक्ति वर्ग किमी० है। इसको गढ़कुम हिमालय भी कहते हैं।  यह एक मध्यवर्ती भूभाग है , जो पूर्वी आद्र हिमालय और उपआद्र पश्चिमी हिमालय के बीच स्थित है। यह उत्तर प्रदेश का मुकुट रहा है। गंगा व यमुना नदियों का उद्गम क्षेत्र है। तीर्थ ...

नर्मदा घाटी परियोजना

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नर्मदा घाटी  परियोजना  (Narmada Valley Project) नर्मदा नदी  पर स्थित नर्मदा घाटी परियोजना भारत की पांचवीं सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है। इसका प्रमुख उद्देश्य , सिंचाई , जल विद्दुत व अन्य विभिन्न कार्यों के लिये जल की आपूर्ति करना है। यह गुजरात ,मध्य प्रदेश , और महाराष्ट्र की संयुक्त परियोजना है। नर्मदा नदी का उद्गम सतपुड़ा पर्वतमाला की अमरकंटक चोटी से हुआ है। इसकी लम्बाई 1312 किमी० है। इस परियोजना के अंतर्गत नर्मदा व उसकी सहायक नदियों पर 30 बड़े बांध , 135 माध्यम श्रेणी व 3000 छोटे बांधों का निर्माण किया जायेगा। इनमे से दो बांध सबसे बड़े होंगे , जिनका विस्तार वर्तमान में विवादास्पद विषय बन गया है।  यह बांध इस प्रकार है--           (१) नर्मदा (इन्दिरा) सागर बांध - इसका निर्माण मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले में किया जा रहा है। इस बाँध के निर्माण से 1.25 लाख हैक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी , 1000 मेगावाट विद्दुत उत्पादन हो सकेगा। इस बाँध के निर्माण की लागत 600 करोड़ रूपए आने की सम्भावना है।       (२) सरदार सरोवर बांध - इसका निर्माण गु...

टिहरी बांध परियोजना

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टिहरी बांध परियोजना  (Tehri Dam Project) इस परियोजना का निर्माण उत्तराखंड राज्य में टिहरी नगर (पुराना) के समीप भागीरथी नदी पर किया गया है। इस बृहद परियोजना की रूपरेखा 1972 में तैयार की गई थी। 11 जनवरी 1987 को भारत और रूस के मध्य एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार इस परियोजना का निर्माण कार्य रूसी इंजीनियरों की देख - रेख में संपन्न हो रहा है। इस परियोजना में टिहरी के निकट भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम से लगभग 1.5 किमी० नीचे की ओर भागीरथी नदी पर 260.5 मीटर ऊंचा चट्टान निर्मित (Rock Fill) बांध बनाया गया है। इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य पेय जल, मत्स्य पालन, पर्यटन विकास , बाढ़ नियंत्रण , भू-क्षरण नियंत्रण , सिंचाई एवं जल विद्दुत उत्पादन करना है। इस बाँध में 260.5 करोड़ घन मीटर जल एकत्रित रहेगा, जिसके द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2.70 लाख हैक्टेयर अतिरिक्त भूमि की सिंचाई और 3500 मेगावाट जल विद्दुत उत्पन्न होगी। इस परियोजना द्वारा 6.04 लाख हैक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई सुविधा को स्थायित्व प्रदान किया जा सकेगा। दिल्ली व उत्तर प्रदेश की लगभग एक करोड़ जनसँख्या को पेय जल मिल सकेगा।    ...

मयूराक्षी परियोजना

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मयूराक्षी परियोजना  (Mayurakshi Project)         यह पश्चिम बंगाल की एक बृहत् परियोजना है जिसमे झारखण्ड तथा पश्चिम बंगाल के समीपवर्ती क्षेत्र में मयूराक्षी नदी पर दो बांध बनाए है हैं। पहला बांध झारखण्ड में सन्थाल परगना जिले के मेसनजोर पहाड़ी क्षेत्र में पश्चिम बंगाल के सूरी नामक नगर से 35 किमी० उत्तर में बनाया गया है जो 640 मीटर लम्बा तथा 47 मीटर ऊँचा है। इसे मेसनजोर अथवा कनाडा बांध के नाम से जाना जाता है। यह सन 1955 में बनकर तैयार हो चुका था। इस बांध द्वारा निर्मित जलाशय में 70 हजार हैक्टेयर मीटर जल एकत्र किया जा सकता है।  दूसरा बांध इसी नदी पर कनाडा बांध से लगभग 35 किमी० नीचे पश्चिम बंगाल राज्य  बीरभूम जिले में सूरी नमक स्थान पर बनाया गया है जो 310 मीटर लम्बा है। बांध के दोनों किनारों से दो नहरें निकली गयी है जिनमे से प्रत्येक की लम्बाई 120 किमी० है। इनके द्वारा बीरभूम , मुर्शिदाबाद, बर्दवान जिलों की लगभग 25 लाख हैक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इसके अतिरिक्त इस परियोजना के अंतर्गत निकली  गयी नहरों से बिहार राज्य की लगभग 10,000 हैक्टेयर भूमि को ...

तुंगभद्रा परियोजना

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तुंगभद्रा परियोजना  (Tungbhadra Project) यह आंध्र प्रदेश तथा कर्णाटक राज्यों संयुक्त परियोजना है, जो कृष्णा नदी की सहायक तुंगभद्रा नदी पर क्रियान्वित की गयी है।  तुंग और भद्रा दो अलग-अलग नदियां है जो कर्णाटक राज्य के 12 पर्वतों से निकलती है तथा कुछ दूर अलग-अलग प्रवाहित होने के उपरांत एक-दूसरे से मिलकर तुंगभद्रा नदी को जन्म देती है। इस  नदी में वर्षाकाल में अधिक जलराशि पाई जाती है। अतः इस नदी का वर्षाकालीन अथाह जलराशि का समुचित उपयोग करने तथा इसकी बाढ़ों पर नियंत्रण कर घाटीवर्ती क्षेत्र में खुशहाली का वातावरण उत्पन्न  करने के उद्देश्य से  नदी पर एक बहुउद्देशीय योजना को क्रियान्वित की गई है जिसके अंतर्गत निम्नलिखित निर्माण कार्य किए गए है -      (1)  तुंगभद्रा बाँध (Tungbhadra Dam) -  परियोजना के अंतर्गत तुंगभद्रा नदी पर कर्णाटक राज्य के बेल्लारी जिले में विजयवाड़ा-हुबली रेलवे लाइन के हास्पेट स्टेशन से 5 किमी० पश्चिम में मल्लापुरम नामक  स्थान पर एक 2.5 किमी० लम्बा तथा 50 मीटर ऊंचा ग्रेनाइट पत्थर एवं सीमेंट का बांध बनाया गया है। जल निका...

नागार्जुन-सागर परियोजना

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नागार्जुन-सागर परियोजना  (Nagarjuna-Sagar Project) प्रायद्वीपीय भारत की यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण नदी घाटी परियोजना है जो कृष्णा नदी के ऊपर क्रियान्वित की गई है। कृष्णा नदी महाराष्ट्र राज्य में सह्याद्री की पहाड़ियों के पूर्वी ढालो से महाबलेश्वर के उत्तर से निकलकर महाराष्ट्र ,कर्णाटक तथा आंध्र प्रदेश राज्यों में प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसका परवाह क्षेत्र लगभग 26 लाख वर्ग किमी० में फैला हुआ है। इनसे उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं को देखते हुए सन 1955-56  में इस नदी पर उपरोक्त परियोजना क्रियान्वित की गयी। इस परियोजना के निम्नलिखित उद्देश्य है -       (१) कृष्णा नदी पर नागार्जुन सागर बांध बनाकर इसकी बाढ़ पर नियंत्रण करना।        (२) सिंचाई हेतु सुविधाएं विकसित करना।        (३) जल विद्दुत का उत्पादन करना।        (४) मछली पालन उद्दोग एवं पर्यटन क्षेत्रों का विकास करना।  परियोजना का प्रारूप  (Plan Of the Project)     (1) नागार्जुन सागर बाँध - इस परियोजना के अंतर्गत कृ...

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबन्धन

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अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबन्धन : International Solar Alliance : अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन  कर्क रेखा और मकर  बीच स्थित सौर संसाधन सम्पन्न देशों की विशिष्ट और प्रौद्योगिकी तैनाती की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई विशिष्ट निकाय नहीं है। इनमे से अधिकांश देश भौगोलिक रूप से सूर्य की किरणों के इष्टतम अवशोषण के लिए स्थित है। वर्ष के दौरान सूर्य के प्रकाश की एक बड़ी मात्रा होती है जिससे लागत प्रभावी सौर ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है और अन्य छोर एक वर्ष में लगभग 300 धूप दिनों के उच्च अलगाव का उपयोग करते है।  अधिकांश देशों में बड़ी कृषि आबादी है। कई देश संभावित सौर ऊर्जा विनिर्माण इको-सिस्टम में अंतराल का सामना करते है। सार्वभौमिक ऊर्जा पहुँच , इक्विटी और सामर्थ्य की अनुपस्थिति अधिकांश सौर संसाधन समृद्ध देशो के लिए आम मुद्दे है। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएएस) की कल्पना सौर संसाधन सम्पन्न देशों के गठबंधन के रूप में की गई है, जो अपनी विशेष ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक आम सहमति वाले दृष्टिकोण के माध्यम से पहचान किए गए अंतराल को सम्बोधित करने के लिए सहयोग करने के लिए एक मंच प्रद...

जैव विविधता कन्वेंशन

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जैव विविधता कन्वेंशन  (Biodiversity Convention) जैव विविधता पर कन्वेंशन :              जैव विविधता पर कन्वेंशन (सीबीडी) तीन मुख्य लक्ष्यों के साथ एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है। जैव विविधता का संरक्षण, जैव विविधता का स्थायी उपयोग , उचित और न्यायसंगत आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का साझाकरण है , इसका समग्र उद्देश्य कार्यों को प्रोत्साहित करना है , जो एक स्थायी भविष्य को जन्म देगा।               जैव विविधता का संरक्षण मानव जाति की एक सामान्य चिंता है। जैव विविधता पर कन्वेंशन सभी स्तरों पर जैव विविधता को शामिल करता है - पारिस्थितिक तंत्र , प्रजातिया और आनुवंशिक संसाधन। यह  जैव प्रौद्दोगिकी को भी शामिल करता है, जिसमे कार्टोसैना प्रोटोकॉल बायोसैफिलिटी के माध्यम से शामिल है। वास्तव में, यह उन सभी संभावित डोमेन को शामिल करता है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जैव विविधता और विकास में इसकी भूमिका से सम्बंधित हैं , विज्ञान, राजनीति और शिक्षा से लेकर कृषि , व्यवसाय , संस्कृति और बहुत कुछ।...

रियो शिखर सम्मलेन

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रियो शिखर सम्मेलन  Rio summit (1972) रियो शिखर सम्मेलन  :               1972 में, स्टॉकहोम, स्वीडन, ने मानव पर्यावरण पर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की मेजबानी की , जिसमे 113 प्रतिनिधियों और दो राष्ट्राध्यक्षों (स्वीडन के ओलाफ पाल्मे और भारत की इंदिरा गाँधी) ने भाग लिया। इस सम्मेलन ने एक मुद्दे के बारे में एक पीढ़ी की जागरूकता को उठाया जो की वैश्विक पर्यावरण के बारे में बहुत कम बात करता है। स्टॉकहोम  सम्मेलन ने दुनिया के एजेंडे में पर्यावरण के लिए एक स्थायी स्थान प्राप्र्त किया और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की स्थापना का नेतृत्व।सम्मेलनऔर उसके बाद पर्यावरण के अंतर्राष्टीय स्वरुप को जाना और विकास और पर्यावरण के बीच सम्बन्ध के विचार को पेश किया। यह कहा गया है कि दुनिया के देशों को एकजुट कारने का एकमात्र तरीका उनके लिए एक आम दुश्मन का सामना करना है. शायद पर्यावरण का ह्रास ही वह शत्रु होगा।        1972 में सम्मेलन के बाद से, कई अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण समझौते हुए है, जिनमे से कई कनाडा द...

कोसी परियोजना

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कोसी परियोजना  (Kosi Project)                                 कोसी नदी अपने मार्ग परिवर्तन तथा विनाशकारी बाढ़ों के लिए कुख्यात कही जाती है। विगत दो सौ वर्षों में यह नदी लगभग 125 किमी० पश्चिम की ओर हट चुकी है। इस नदी का उद्गम बिहार के उत्तर में लगभग 40 किमी दूर तिब्बत के पठार से 5500 मीटर की ऊंचाई से होता है जहां से निकलकर यह बृहत हिमालय क्षेत्र  में कई तंग घाटियों से होकर तिब्बत तथा नेपाल में प्रवाहित होती हुई बिहार राज्य में प्रवेश करती है तथा इस राज्य में 260 किमी० की यात्रा तय करके गंगा नदी में मिल जाती है। वर्षा ऋतु में तो इस  नदी का जल कहीं-कहीं 32 किमी० चौड़ाई में फ़ैल जाता है जिससे बिहार राज्य में प्रतिवर्ष लगभग 3000 से 5000 वर्ग किमी क्षेत्र जलप्लावित हो जाता है जिसके फलस्वरूप यह क्षेत्र मलेरिया आदि बीमारियों के प्रकोप से ग्रस्त हो जाते है। इस नदी का पानी कभी कभी 24 घंटे में 1 मीटर बढ़ जाता। है, जिससे गाँव के गाँव जलमग्न हो जाते है।  अतः इस विनाशकारी प्रक्रिया को रोकने के लिए कोसी नदी...

चम्बल परियोजना

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चम्बल परियोजना  ( Chambal Project ) यह परियोजना मध्य प्रदेश तथा राजस्थान राज्यों की सम्मिलित योजना है जिसे चम्बल नदी के ऊपर विकसित किया गया है। चम्बल नदी राजस्थान एवं उत्तरी मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण नदी है जो मध्य प्रदेश में विंध्याचल श्रेणी के उत्तरी ढालों से 854 मीटर की ऊंचाई से निकलकर लगभग 320 किमी० उत्तर दिशा में बहकर , इंदौर व सीतामऊ के निकट से होती हुई , मध्य प्रदेश में कुल 362 किमी० की यात्रा तय करने के उपरांत राजस्थान में प्रवेश कर जाती है तथा कोटा के निकट पठारी प्रदेश को छोड़कर मैदानी प्रदेश में प्रविष्ट हो जाती है। यहाँ से यह उत्तर-पूर्वी दिशा में मुड़कर राजस्थान में 306 किमी० प्रवाहित होकर  उत्तर प्रदेश में प्रवेश करके इटावा जिले में पहुंचकर यमुना में मिल  जाती है। 1045 किमी० की लम्बाई में विस्तृत इस नदी में 1.4 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र का जल बहकर आता है। वर्षा ऋतु में यह नदी पूर्ण जल प्लावित होकर अपनी घाटी  निचले  भागो में बाढ़ तथा वर्ष के शेष महीनो में सूखा एवं अकाल की दशाएं प्रस्तुत करती है।  अतः  नदी की वर्षा कालीन अपार जल राशि का उचित उप...

अन्तर्राष्ट्रीय समझौते /प्रयास

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अन्तर्राष्ट्रीय समझौते  (International Agreements) मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल                     1973 में, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में , इरविन , मारियो मोलिना ने अपने सलाहकार एफ , शेरवुड रोलैंड को सुझाव दिया कि सीएफसी पृथ्वी के वातावरण  कुछ प्रभाव डाल सकते है। यद्द्यपि यह शोध साहित्य पर आधारित हो, रॉलैंड ने इस विचार को बढ़ावा देना शुरू किया कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन स्ट्रैटोस्फेरिक ओजोन को नष्ट कर सकता है। प्रयोगशाला पुष्टि के बिना , CFCs  पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक अभियान शुरू किया गया था। पदार्थों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जो ओजोन परत को परिभाषित करता है (ओजोन परत के संरक्षण के लिए वियना कन्वेंशन का एक प्रोटोकॉल ) ओजोन की क्षमता के लिए संदिग्ध कई पर्दार्थों के उत्पादन को चरणबद्ध करके ओजोन परत की रक्षा के लिए बनाया गया एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।  जब दक्षिणी ध्रुव पर "ओजोन के छेद " के बारे में प्रचार सीएफसी एयरोसोल्स पर किया गया था , तो सीएफसी को प्रतिबंधित काने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल वैश्विक पुष्टि के करीब पहुँच ग...

हीराकुड परियोजना

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हीराकुड परियोजना  (Hirakud Project) महानदी प्रायद्वीप भारत की एक महत्वपूर्ण नदी है जो छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले में बस्तर की पहाड़ियों से निकलकर अपनी कुल लम्बाई 885 किमी० में से 860 किमी० लम्बा मार्ग उड़ीसा में तय करती है। इसका प्रवाह क्षेत्र लगभग 1.42 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र में फैला हुआ है।  दामोदर नदी अपनी बाढ़ों के लिए  प्रसिद्ध है। विगत 100 वर्षों में इस नदी की निचली घाटी विशेष रूप से कटक के आगे का डेल्टाई प्रदेश 30 बार बाढ़ का प्रकोप झेल चुका है। अतः इस नदी के घाटवर्ती क्षेत्र के निवासियों को बाढ़, सूखा , एवं अकाल से उत्पन्न समस्याओ से छुटकारा दिलाने तथा इस क्षेत्र का चतुर्मुखी विकास करने के लिए सन 1948 में महानदी पर एक बहुउद्देशीय परियोजना आरंभ की गई जिसे हीराकुड परियोजना के नाम से जाना जाता है। इस परियोजना के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य थे - (१) महानदी तथा उसकी सहायक नदियों पर बांध बना कर प्रायः प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ों पर नियंत्रण करना।  (२) बांधों द्वारा निर्मित जलाशयों से सिंचाई एवं आंतरिक जल परिवहन हेतु नहरें निकलना।  (३) राउरकेला के लोहा इस्पात कारखाने...

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम

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   पर्यावरण संरक्षण अधिनियम , 1986  पर्यावरण संरक्षण अधिनियम ,1986 और उसका खंड 26 भारत की संसद का एक अधिनियम है। भोपाल त्रासदी के मद्देनज़र ,भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत 1986 को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाया गया। मार्च 1986 में पारित , यह 19 नवम्बर 1986 को लागू हुआ। इसमें 26 खंड हैं।  अधिनियम का उद्देशय मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मलेन के निर्णयों को करना है। वे मानव पर्यावरण के संरक्षण और सुधर और मनुष्यों , अन्य जीवित प्राणियों , पौधों और संपत्ति के लिए खतरों की रोकथाम से सम्बंधित है।  अधिनियम एक 'छाता ' कानून है जिसे पिछले कानूनों , जैसे जल अधिनियम और वायु अधिनियम के तहत स्थापत विभिन्न केंद्रीय और राज्य प्राधिकरणों की गतिविधियों के केंद सरकार के समन्वय के लिए एक रूरेखा प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह अधिनियम 1986 में भारत की संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था।  जून 1972 में स्टॉकहोम में , जिसमे भारत ने भाग लिया , मानव पर्यावरण की सुरक्षा और सुधर के लिए उचित कदम उठाने के लिए और जबकि अभी तक के फैसलों को लागू करने के लिए आवश्...

पेरिस समझौता

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पेरिस समझौता  पेरिस समझौता कन्वेंशन का निर्माण करता है और पहली बार सभी देशों को जलवायु परिवर्तन से  निपटने के महत्वकांक्षी प्रयास करने और इसके प्रभावों के अनुकूल होने के लिए एक आम कारण  के रूप में लता है , ताकि विकासशील देशों को ऐसा करने में सहायता मिले।  जैसे - यह वैश्विक जलवायु प्रयास में एक नया पाठ्यक्रम बताता है।  पेरिस समझौता केंद्रीय उद्देश्य कि वैश्विक तापमान में वृद्धि से जलवायु परिवर्तन के खतरे की वैश्विक प्रतिक्रिया को मजबूत करने के लिए इस सदी में पूर्व औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस  नीचे और तापमान वृद्धि को 1.5  डिग्री सेल्सियस तक भी सीमित  प्रयासों को आगे बढ़ाया जाए।  इसके अतिरिक्त , समझौते का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए देशो की क्षमता को मजबूत करता है।  इन महत्वकांक्षी लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए , उपयुक्त वित्तीय प्रवाह , एक नई प्रौद्योगिकी रूपरेखा और एक विस्तारित क्षमता नर्माण ढांचा तैयार किया जाएगा , इस प्रकार विकासशील देशों और सबसे कमजोर देशों द्वारा अपने स्वयं के राष्ट्रीय उद्देयों के अनुर...

दामोदर घाटी परियोजना

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दामोदर घाटी परियोजना  (Damodar Valley Project) दामोदर नदी झारखण्ड राज्य की एक महत्वपूर्ण नदी है जो इसके पलामू जिले में छोटा नागपुर पठार की 610 मीटर ऊंची पहाड़ियों से निकलकर इस राज्य में 290 किमी० की लम्बाई में प्रवाहित होने के उपरांत पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश कर जाती है , जहां यह 240 किमी० की यात्रा तय करके कोलकाता से 50 किमी० नीचे हुगली नदी में मिल जाती है। जमुनिया, बाराकर , कोनार तथा बोकारो इसकी प्रमुख सहायक नदियां है।  सन 1923 से 1943 के बीच इस नदी में 16 बार भीषण बाढ़ें आईं जिनमे 1913, 1919, 1935, तथा 1943 की बाढ़ें अत्यंत भयानक थी। उस समय बाढ़ के जल का प्रवाह 6,50,000 क्यूसेक अनुमानित किया गया है।  नदी की विध्वंसात्मक कार्यवाही से होने वाले अपार जन-धन की हानि को ध्यान में रखते हुए सन 1948 में भारत सरकार द्वारा दामोदर घाटी निगम की स्थापना की गई।   परियोजना का प्रारूप   (Plan of the Project)    सम्पूर्ण परियोजना के अन्तर्गत 8 बांध , एक अवरोधक बांध , बांधो के निकट जल-विद्दुत उत्पादन केंद्रों  अतिररिक्त बोकारो , चंद्रपुरा तथा दुर्गापु...