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हीराकुड परियोजना
(Hirakud Project)
महानदी प्रायद्वीप भारत की एक महत्वपूर्ण नदी है जो छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले में बस्तर की पहाड़ियों से निकलकर अपनी कुल लम्बाई 885 किमी० में से 860 किमी० लम्बा मार्ग उड़ीसा में तय करती है। इसका प्रवाह क्षेत्र लगभग 1.42 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र में फैला हुआ है। दामोदर नदी अपनी बाढ़ों के लिए प्रसिद्ध है। विगत 100 वर्षों में इस नदी की निचली घाटी विशेष रूप से कटक के आगे का डेल्टाई प्रदेश 30 बार बाढ़ का प्रकोप झेल चुका है। अतः इस नदी के घाटवर्ती क्षेत्र के निवासियों को बाढ़, सूखा , एवं अकाल से उत्पन्न समस्याओ से छुटकारा दिलाने तथा इस क्षेत्र का चतुर्मुखी विकास करने के लिए सन 1948 में महानदी पर एक बहुउद्देशीय परियोजना आरंभ की गई जिसे हीराकुड परियोजना के नाम से जाना जाता है। इस परियोजना के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य थे -
(१) महानदी तथा उसकी सहायक नदियों पर बांध बना कर प्रायः प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ों पर नियंत्रण करना।
(२) बांधों द्वारा निर्मित जलाशयों से सिंचाई एवं आंतरिक जल परिवहन हेतु नहरें निकलना।
(३) राउरकेला के लोहा इस्पात कारखाने के लिए जल एवं जल-विद्दुत की आपूर्ति करना।
(४) बांधों के निकट विद्दुत-गृह स्थापित कर जल विद्दुत का उत्पादन करना।
(५) मत्स्य उद्द्योग का विकास करना।
(६) इन सभी उद्देश्यों के अतिरिक्त मिट्टी के कटाव पर अँकुश लगाना , डेल्टाई भाग में चावल तथा जूट की खेती को प्रोत्साहन देना , वन लगाना तथा घाटीवर्ती क्षेत्र के खनिज संसाधनों का समुचित दोहन करना आदि।
परियोजना का स्वरुप
(Plan of the Project)
इस योजना को दो चरणों में पूर्ण किया गया है -
(1) हीराकुड बाँध (Hirakud Dam) - प्रथम चरण में इस परियोजना पर 68 करोड़ रुपया व्यय किया गया था। इस चरण के अंतर्गत महानदी पर उड़ीसा के सम्भलपुर जिले में सम्भलपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 10 किमी० पश्चिम की ओर हीराकुड नामक स्थान पर प्रमुख बांध बनाया गया है, जो की 4.8 लम्बा तथा 61 मीटर ऊँचा है। बांध को सुरक्षा प्रदान करने हेतु इसके बायीं और दायी ओर क्रमशः 10 किमी० लम्बे मिट्टी के पुश्ते या बांध बनाए गए है। इस प्रकार सम्मिलित रूप से इन तीनो बांधो की कुल लम्बाई 25 किमी० है। इस बांध द्वारा निर्मित जलाशय का क्षेत्रफल लगभग 750 किमी० है तथा इसमें 8100 लाख घन मीटर जल एकत्र किया जा सकता है। इसके द्वारा 25,000 घन मीटर प्रति सेकेण्ड की गति से आने वाली बाढ़ों को नियंत्रित किया जा सकता है। इस बांध पर निर्माण कार्य 1948 में आरम्भ किया गया था जो 1957 में बनकर पूर्ण हुआ।
(2) नहरें (Canals) - बांध के जलाशय से तीन प्रमुख नहरें निकाली गई है। इनमे वरगढ़ नहर बांध के दाहिने किनारे से तथा सम्भलपुर एवं सेसब नहरें इसके बाये किनारे से निकली गयी है। मुख्य नहरों की कुल लम्बाई 147 किमी० तथा इनकी उपशाखाओं की लम्बाई 740 किमी० है। इन नहरों से उड़ीसा के सम्भलपुर तथा बेलनगिरि जिलों की लगभग 2.5 लाख हैक्टेयर भूमि की सिंचाई सुविधा प्राप्त हुई है।
(3) विद्दुत शक्ति-गृह (Power House) - बांधों के निकट ही एक 123 मेगावाट क्षमता वाले विद्दुत गृह की स्थापना की गयी है, जिस पर 4 विद्दुत उत्पादक इकाइयां लगाई गई है। यहां से उत्पन्न होने वाले जल विद्दुत का राउरकेला के लोहा इस्पात उद्द्योग , हीराकुड के एल्युमीनियम कारखाने, राजगंगपुर के सीमेंट उद्द्योग,बृजराजपुर के कागज़ तथा सूती वस्त्र उद्द्योग आदि में उपयोग किया जाता है।
द्वितीय चरण के अन्तर्गत इस परियोजना पर 15 करोड़ रूपए व्यय किये गए तथा निम्नलिखित निर्माण कार्य किये गए।
महानदी के निचले भाग में सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध कराने तथा हीराकुड के जलाशय को संतुलित करने हेतु इस नदी पर टीकापारा तथा नराज नमक स्थनो पर दो अन्य बांध बनाये गए है तथा इनसे नहरे निकलकर कटक एवं पुरी जिलों की लगभग 1.5 लाख हैक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधाएँ प्रदान की गयी हैं।
हीराकुड से लगभग 27 किमी० दूर दक्षिण में चिपलीमा में 72 मेगावाट क्षमता वाले एक दूसरे शक्ति गृह की स्थापना की गयी है , जिसमे 25 मेगावाट उत्पादन क्षमता वाली प्रति इकाई वाली 3 इकाइयाँ लगाई गयी है। इसी चरण के अन्तर्गत हीराकुड के शक्ति गृह की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने हेतु इसमें 37.5 मेगावाट क्षमता की प्रति इकाई वाली दो इकाईयां और स्थापित की गयीं है और इस प्रकार द्वितीय चरण की समाप्ति के उपरांत इस परियोजना की कुल विद्दुत उत्पादन क्षमता 270 मेगावाट हो गयी है।
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