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चम्बल परियोजना
(Chambal Project)
यह परियोजना मध्य प्रदेश तथा राजस्थान राज्यों की सम्मिलित योजना है जिसे चम्बल नदी के ऊपर विकसित किया गया है। चम्बल नदी राजस्थान एवं उत्तरी मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण नदी है जो मध्य प्रदेश में विंध्याचल श्रेणी के उत्तरी ढालों से 854 मीटर की ऊंचाई से निकलकर लगभग 320 किमी० उत्तर दिशा में बहकर , इंदौर व सीतामऊ के निकट से होती हुई , मध्य प्रदेश में कुल 362 किमी० की यात्रा तय करने के उपरांत राजस्थान में प्रवेश कर जाती है तथा कोटा के निकट पठारी प्रदेश को छोड़कर मैदानी प्रदेश में प्रविष्ट हो जाती है। यहाँ से यह उत्तर-पूर्वी दिशा में मुड़कर राजस्थान में 306 किमी० प्रवाहित होकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश करके इटावा जिले में पहुंचकर यमुना में मिल जाती है। 1045 किमी० की लम्बाई में विस्तृत इस नदी में 1.4 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र का जल बहकर आता है। वर्षा ऋतु में यह नदी पूर्ण जल प्लावित होकर अपनी घाटी निचले भागो में बाढ़ तथा वर्ष के शेष महीनो में सूखा एवं अकाल की दशाएं प्रस्तुत करती है।
अतः नदी की वर्षा कालीन अपार जल राशि का उचित उपयोग करने तथा घाटवर्ती क्षेत्र के निवासियों को सूखा एवं अकाल की दशाओं से छुटकारा दिलाने हेतु सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध करने हेतु सर्वप्रथम सन 1943 में चम्बल नदी पर एक परियोजना शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया परन्तु योजना की वास्तविक शुरुआत सन 1953 से ही संभव हो सकी।
परियोजना का प्रारूप
(Plan of the Project)
सम्पूर्ण परियोजना तीन चरणों के अंतर्गत पूर्ण की गई है। प्रथम चरण के अंतर्गत गांघी सागर बांध ,कोटा अवरोधक ,विद्दुत गृह , विद्दुत सम्प्रेषण लाइनें तथा सिंचाई हेतु नहरों का निर्माण किया गया है। द्वितीय चरण अंतर्गत राणा प्रताप सागर बांध तथा इस बांध पर एक विद्दुत गृह का निर्माण किया गया है।
प्रथम चरण
(1) गाँधी सागर बांध (Gandhi Sagar Dam) - यह बाँध सन 1959 में चम्बल नदी पर मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिले में प्रसिद्ध चौरासीगढ़ किले से 8 किमी० नीचे मध्य प्रदेश एवं राजस्थान राज्यों की सीमा पर बनाया गया है। यह बाँध 514 मीटर लम्बा तथा 62 मीटर ऊंचा है तथा इससे निर्मित जलाशय में 7700 लाख घन मीटर जल एकत्र किया जा सकता है। जल निकासी हेतु इस बांध में 9 दरवाजे लगाए गए है। इस बाँध के दोनों किनारो से नहरें निकाली गई है, जिनसे लगभग 5 लाख हैक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इस बांध के निर्माण में 1,400 करोड़ रूपए व्यय हुआ है। बांध के निकट ही 5 करोड़ की लगत से एक जल-विद्दुत गृह स्थापित किया गया है जिसमे 23,000 किलोवाट प्रति इकाई की क्षमता वाली 5 इकाइयां लगाई गई है।
(2) कोटा अवरोधक (Kota Barrage) - यह बांध चम्बल नदी पर कोटा शहर से लगभग 1 किमी० उत्तर की ओर बनाया गया है। इसका प्रमुख उदेश्य नदी के दाहिने एवं बाएं किनारे से निकाली गयी नहरों की जल आपूर्ति करना है। इसके जलाशय में 11 लाख घन मीटर जल एकत्र किया जा सकता है। बाढ़ के जल की निकासी हेतु इस बांध में 16 फाटक लगाए गए है। यह सन 1960 में बनकर तैयार हुआ है।
(3) नहरें (Canals) - कोटा अवरोधक बांध के निकट से नदी के दोनों किनारो से नहरें निकै गयी है जिनसे राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में सिंचाई की जाती है। बाएं किनारे से निकाली गयी नहर लगभग 20 किमी० बहने के पश्चात् बूंदी तथा रुप्रेन शाखाओं में बंट जाती है जिसकी कुल लम्बाई 169 किमी० है। इन नहरों से राजस्थान के बूंदी, कोटा, टोंक, तथा सवाई माधोपुर जिलों में सिंचाई की जाती है। दाहिने किनारे से निकाली गयी नहर 364 किमी० की है तथा इससे राजस्थान एवं मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होती है।
द्वितीय तथा तृतीय चरण
(1) राणाप्रताप सागर बांध (Rana Pratap Sagar Dam) - परियोजना के द्वितीय चरण के अंतर्गत राजस्थान राज्य में बूंदी एवं कोटा जिलों की सीमा पर गाँधी सागर बांध से लगभग 56 किमी० उत्तर की ओर रावत भाटा नामक स्थान पर जहां चम्बल नदी पर्याप्त संकरी घाटी से होकर बहती है 1.2 किमी० लम्बा 54 मीटर ऊंचा राणा सागर बांध बनाया गया है। बांध द्वारा निर्मित जलाशय में 2900 लाख मीटर जल एकत्र किया जा सकता है। इससे 1.2 लाख हैक्टेयर भूमि की सिंचाई सुविधाएं प्राप्त हुई है।
विद्दुत उत्पादन हेतु मुख्य बांध से 2.5 किमी० ऊपर एक मिट्टी का बांध बनाया गया है जो 5 किमी० लम्बा तथा 53 मीटर ऊंचा है। मुख्य बांध के निकट एक विद्दुत गृह स्थापित किया गया है जिसमे 43,000 किलोवाट प्रति इकाई की क्षमता वाली चार विद्दुत उत्पादन इकाइयां लगाई गई है।
(2) कोटा या जवाहर सागर बांध (Kota or Jawahar Sagar Dam) - परियोजना तृतीय चरण के अंतर्गत कोटा एवं बूंदी जिलों की सीमा पर राणा प्रताप सागर बाँध से 32 किमी० उत्तर-पूर्व की ओर कोटा शहर से 20 किमी० ऊपर चम्बल पर जवाहर सागर बांध बनाया गया है जो 540 मीटर लम्बा तथा 25 मीटर ऊंचा है। इस बांध का प्रमुख उद्देश्य जल-विद्दुत उत्पन्न करना है। यथार्थ में यह एक पिकअप बांध है जहां पहले दोनों बाँधों गाँधी सागर एवं राणा प्रताप सागर बांध से छोड़े गए जल को एकत्र करके जल विद्दुत उत्पादन किया जाता है। बांध के समीप सन 1971 में एक विद्दुत शक्ति गृह का निर्माण किया गया है जिसमे 33,000 किलोवाट प्रति इकाई की क्षमता वाली 3 इकाइयां लगायी गयी है। तृतीय चरण के अंतर्गत 16 करोड़ रूपए के परिव्यय का प्रावधान रखा गया था।
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